INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 15 July 2021 – PuuchoIAS


 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-I

1. अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण संबंधी मुद्दों की जाँच हेतु आयोग

 

सामान्य अध्ययन-II

1. सरकारी कर्मचारियों की बर्खास्तगी के संदर्भ में संवैधानिक प्रावधान

 

सामान्य अध्ययन-III

1. भारत में वाणिज्यिक जहाजों के संचालन को प्रोत्साहन देने संबंधी योजना

2. UV-C तकनीक

3. नए यूरोपीय जलवायु कानून

4. कर्नाटक पुलिस में ‘अपराध-स्थल अधिकारी’

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. कांवड़ यात्रा

2. कोंगु नाडु

3. केमोटैक्सिस

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: सामाजिक सशक्तीकरण, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद और धर्मनिरपेक्षता।

अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण संबंधी मुद्दों की जाँच हेतु आयोग


(Commission to Examine Sub Categorization of other Backward Classes)

संदर्भ:

हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने, केंद्रीय सूची में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के भीतर उप-वर्गीकरण से जुड़े मुद्दों पर गौर करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत गठित आयोग के कार्यकाल में ग्यारहवें विस्तार को मंजूरी दे दी है।

पृष्ठभूमि:

वर्ष 2015 में ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ (National Commission for Backward Classes- NCBC) द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes- OBCs) के उप-वर्गीकरण का प्रस्ताव पेश किया गया था।

इसके बाद, अक्टूबर 2017 में, राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा, संविधान के अनुच्छेद 340 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अंतर्गत, ‘अत्यंत पिछड़े वर्गों’ (Extremely Backward Classes- EBCs) को प्राथमिकता देते हुए सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने हेतु, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति जी. रोहिणी की अध्यक्षता में OBC समूह के उप-श्रेणीकरण संबंधी विषयों का अन्वेषण करने हेतु एक आयोग की नियुक्ति की गयी थी।

‘अनुच्छेद 340’ के बारे में:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 के अंतर्गत पिछड़े वर्गों की स्थितियों की जांच के लिए एक आयोग की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है।

इसके अंतर्गत, राष्ट्रपति, भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की दशाओं का अन्वेषण करने हेतु, अपने आदेश द्वारा एक आयोग नियुक्त कर सकते हैं। इस आयोग में, राष्ट्रपति, जिन व्यक्तियों को अन्वेषण हेतु उचित समझेगे, सम्मिलित कर सकते है।

संवैधानिक आधार:

संविधान के अनुच्छेद 14 में ‘विधि के समक्ष समता’ की गारंटी प्रदान की गयी है। इसका अर्थ है, कि गैर-बराबरों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं किया जा सकता है। उन्नत वर्गों के साथ समान स्तर पर लाने हेतु, गैर-बराबरों के उत्थान के लिए उपाय किए जाने की आवश्यकता है।

अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार, राज्य, किसी भी पिछड़े वर्ग के नागरिकों के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए कोई प्रावधान कर सकते हैं, यदि, राज्य की राय में, इन समुदायों का राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं हैं।

उप-वर्गीकरण की आवश्यकता:

OBC समूह के उप- वर्गीकरण से OBC समुदायों के मध्य अधिक पिछड़े समूहों को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ सुनिश्चित होगा।

वर्तमान में, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) में कोई उप-वर्गीकरण नहीं है तथा सभी समुदायों को संयुक्त रूप से 27% आरक्षण प्रदान किया जाता है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि केंद्र सरकार के संस्थानों में ओबीसी कोटा की सिफारिश 1992 में लागू की गई और शिक्षा संस्थानों में ओबीसी आरक्षण वर्ष 2006 में लागू हुआ था? पूरे आंदोलन के बारे में जानने हेतु पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 340, 14, 15 और 16 का अवलोकन
  2. OBC समूह के उप-श्रेणीकरण संबंधी विषयों का अन्वेषण करने हेतु आयोग
  3. अनुच्छेद 340 के तहत राष्ट्रपति की शक्ति
  4. मंडल आयोग
  5. OBC की केंद्रीय सूची में समुदायों को सम्मिलित करने या बाहर करने की शक्तियां।
  6. राज्य की OBC को श्रेणीबद्ध करने की शक्ति

मेंस लिंक:

OBC समूह के उप-श्रेणीकरण की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

सरकारी कर्मचारियों की बर्खास्तगी के संदर्भ में संवैधानिक प्रावधान


संदर्भ:

हाल ही में, संघ शासित प्रदेश के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने संविधान के अनुच्छेद 311(2)(c) के प्रावधानों के तहत जम्मू-कश्मीर के 11 सरकारी कर्मचारियों को कथित तौर पर आतंकी समूहों के साथ संबंध रखने के लिए बर्खास्त कर दिया है।

संवैधानिक प्रावधान:

संविधान का अनुच्छेद 311 “संघ या राज्य के अधीन सिविल सेवाओं में नियोजित व्यक्तियों को पदच्युत करने, पद से हटाए जाने या पदानवत करने” से संबंधित है।

  • अनुच्छेद 311 (2): के अनुसार, किसी लोक सेवक को, उसके विरुद्ध आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिए बगैर उसे पदच्युत अथवा पद से नहीं हटाया जाएगा या पद में अवनत नहीं किया जाएगा।
  • अनुच्छेद 311(2)(a): व्यक्ति को आपराधिक आरोप पर सिद्धदोष ठहराया जाने पर ‘जांच’ संबंधी संरक्षोपाय लागू नहीं होंगे।
  • अनुच्छेद 311(2)(b): “जहाँ किसी व्यक्ति को पदच्युत करने या पद से हटाने या पंक्ति में अवनत करने के लिए सशक्त प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि किसी कारण से, जो उस प्राधिकारी द्वारा लिखित रूप में दर्ज किया जाएगा, कि इस मामले में जाँच करना युक्तियुक्त रूप से साध्य नहीं है”, तो इस स्थिति में भी ‘जांच’ संबंधी संरक्षोपाय लागू नहीं होंगे।
  • अनुच्छेद 311(2)(c): जहाँ, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल का यह समाधान हो जाता है कि राज्य की सुरक्षा के हित में यह समीचीन नहीं है कि ऐसी जाँच की जाए। इस स्थिति में भी ‘जांच’ संबंधी संरक्षोपाय लागू नहीं होंगे। ।

उपलब्ध उपाय:

बर्खास्त कर्मचारियों के लिए एकमात्र उपलब्ध उपाय, उच्च न्यायालय में सरकार के फैसले को चुनौती देना है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 310 में ‘प्रसादपर्यंत पद धारण करने के सिद्धांत’ को शामिल किया गया करता है? इसका क्या तात्पर्य है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 311 (2) के बारे में।
  2. संविधान के तहत लोक सेवकों के लिए प्राप्त संरक्षोपाय

मेंस लिंक:

संविधान के अंतर्गत लोक सेवकों के लिए प्राप्त संरक्षोपायों पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

भारत में वाणिज्यिक जहाजों के संचालन को प्रोत्साहन देने संबंधी योजना


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ‘भारतीय पोत परिवहन कंपनियों’ को सब्सिडी सहयोग उपलब्ध कराकर भारत में वाणिज्यिक जहाजों के संचालन को प्रोत्साहन देने की योजना को स्वीकृति प्रदान की है।

योजना के प्रमुख बिंदु:

  1. इस योजना के तहत, मंत्रालयों और ‘केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्रक उद्यमों’ (CPSEs) द्वारा सरकारी कार्गो के आयात के लिए जारी वैश्विक निविदाओं में ‘भारतीय पोत परिवहन कंपनियों’ को 1,624 करोड़ रुपये का सब्सिडी सहयोग प्रदान किया जा रहा है।
  2. योजना के तहत, बजटीय सहायता सीधे संबंधित मंत्रालय/विभाग को प्रदान की जाएगी।
  3. सब्सिडी सहायता सिर्फ उन्हीं जहाजों को दिया जाएगा, जिन्होंने योजना के कार्यान्वयन के बाद ठेका हासिल किया है।
  4. योजना के तहत, एक साल से दूसरे साल में और विभिन्न मंत्रालयों/विभागों के भीतर व्यय के लिए कोष के आवंटन में लचीलापन लाया जाएगा।
  5. 20 वर्ष से ज्यादा पुराने जहाज योजना के अंतर्गत किसी प्रकार की सब्सिडी के लिए पात्र नहीं होंगे।

योजना का महत्व:

  1. रोजगार सृजन की क्षमता: भारतीय बेड़े में वृद्धि से भारतीय नाविकों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा क्योंकि भारतीय जहाजों को केवल भारतीय नाविकों को नियुक्त करना आवश्यक होता है।
  2. नाविक बनने के इच्छुक कैडेट्स को जहाजों पर ऑन-बोर्ड प्रशिक्षण प्राप्त करना आवश्यक होता है। भारतीय जहाज, भारतीय कैडेट लड़कों और लड़कियों को प्रशिक्षण के स्लॉट उपलब्ध कराएंगे।
  3. इससे वैश्विक पोत परिवहन में भारतीय नाविकों की हिस्सेदारी बढ़ेगी और इस प्रकार भारत से दुनिया में नाविकों की आपूर्ति की गुना बढ़ जाएगी।
  4. इसके अलावा, भारतीय बेड़े के विस्तार से जहाज निर्माण, जहाज मरम्मत, भर्ती, बैंकिंग आदि सहायक उद्योगों के विकास से अप्रत्यक्ष रोजगार भी सृजित होंगे और भारतीय ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (GDP) में वृद्धि होगी।

इन उपायों की आवश्यकता:

7,500 किलोमीटर लंबा समुद्र तट, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आयत-निर्यात (EXIM) व्यापार जो सालाना आधार पर लगातार बढ़ रहा है, 1997 के बाद से पोत परिवहन में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की नीति होने के बावजूद, भारतीय पोत परिवहन उद्योग और भारत का राष्ट्रीय बेड़ा अपने वैश्विक समकक्षों की तुलना में काफी छोटा है।

  • वर्तमान में, भारतीय बेड़े की क्षमता के लिहाज से वैश्विक बेड़े में महज 1.2 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
  • वर्तमान में भारतीय बेड़े में क्षमता के मामले में विश्व के बेड़े का मात्र 2% शामिल है।
  • भारत के ‘आयत-निर्यात व्यापार’ की ढुलाई में भारतीय जहाजों की हिस्सेदारी 1987-88 में 40. 7% से घटकर 2018-19 में लगभग 7.8% रह गई है।
  • परिणामस्वरूप विदेशी पोत परिवहन कंपनियों को किए जाने वाले ‘माल ढुलाई बिल भुगतान’ के मद में विदेशी मुद्रा व्यय में वृद्धि हुई है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘जहाजों के पुनर्चक्रण’ (Recycling) के लिए ‘हांगकांग अभिसमय’ के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. योजना के प्रमुख बिंदु
  2. लाभ और पात्रता

मेंस लिंक:

‘भारत में वाणिज्यिक जहाजों के संचालन को प्रोत्साहन देने संबंधी योजना’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी।

 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

UV-C तकनीक


(UV-C technology)

संदर्भ:

संसद में ‘SARS-COV-2 के वायु में संचरण को कम करने’ के लिए शीघ्र ‘पराबैंगनी-सी’ (Ultraviolet-C) या यूवी-सी (UV-C) कीटाणुशोधन तकनीक लगायी जाएगी।

‘यूवी-सी वायु-वाहिका कीटाणुशोधन प्रणाली’ के बारे में:

(UV-C air duct disinfection system)

इस प्रणाली को ‘वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद’ (CSIR) के ‘केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन’ (Central Scientific Instruments Organisation) / ‘CSIR-CSIO’ द्वारा विकसित किया गया है।

  • यह सिस्टम, हर तरह की मौजूदा वायु-वाहिकाओं में फिट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है और इसमें, उस स्थान पर रहने के समय और यूवी-सी तीव्रता (UV-C intensity) का उपयोग करते हुए विषाणुनाशक खुराक (virucidal dosages) को मौजूदा स्थान के अनुसार अनुकूलित किया जा सकता है।
  • यूवी-सी प्रकाश के अंशशोधित स्तरों (calibrated levels) द्वारा ऐरोसॉल कणों में मौजूद वायरस निष्क्रिय हो जाता है।
  • इस सिस्टम का, ऑडिटोरियम, मॉल, शैक्षणिक संस्थानों, एसी बसों और रेलवे आदि जगहों में उपयोग किया जा सकता है।

‘पराबैगनी विकिरण’ क्या होता है?

‘पराबैगनी विकिरण’ (UV radiation), ‘एक्स-रे’ और ‘दृश्य प्रकाश’ (Visible Light) के बीच ‘विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम’ का हिस्सा होता है।

सूर्य का प्रकाश, पराबैगनी विकिरण का सबसे आम रूप है, जिसमे मुख्यतः तीन प्रकार की अल्ट्रावायलेट किरणें उत्पन्न होती हैं:

  1. UVA
  2. UVB
  3. UVC

प्रमुख तथ्य:

  • UVA किरणों की तरंग दैर्ध्य सर्वाधिक लंबी, इसके बाद UVB किरणों तथा UVC किरणों की तरंग दैर्ध्य सबसे छोटी होती हैं।
  • UVA और UVB किरणों का संचरण वायुमंडल के माध्यम होता है। जबकि, पृथ्वी की ओजोन परत द्वारा सभी UVC तथा कुछ UVB किरणें अवशोषित हो जाती हैं। इस प्रकार, हम जिन अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में आते हैं, उनमे अल्प मात्रा में UVB किरणों सहित अधिकांशतः UVA किरणें होती है।

अल्ट्रावायलेट किरणों का उपयोग:

पराबैगनी विकिरण (UV radiations), का प्रयोग सामान्यतः सूक्ष्मजीवों को मारने के लिए किया जाता है।

  • पराबैंगनी रोगाणुनाशक विकिरण (Ultraviolet germicidal irradiation -UVGI), जिसे UV-C भी कहा जाता है, एक कीटाणुशोधन (disinfection) विधि है।
  • UVGI में लघु-तरंग दैर्ध्य पराबैंगनी प्रकाश का प्रयोग सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने अथवा निष्क्रिय करने के लिए किया जाता है, इसके दवारा सूक्ष्मजीवों के न्यूक्लिक एसिड को नष्ट कर दिया जाता है अथवा यह उनके DNA को भंग कर देता है जिस कारण सूक्ष्मजीव आवश्यक कोशिकीय क्रियाएं करने में तथा वृद्धि करने में अक्षम हो जाते हैं।
  • UVGI का प्रयोग भोजन, हवा तथा जल शोधन, जैसे विभिन्न अनुप्रयोगों में किया जाता है।

क्या यह मनुष्यों के लिए सुरक्षित है?

शोध अध्ययनों के अनुसार, इस उपकरण को विशेष रूप से निर्जीव चीजों को कीटाणुरहित करने के लिए विकसित किया गया है। इसलिए, इस उपकरण में प्रयुक्त यूवी-सी विकिरण जीवित प्राणियों की त्वचा और आंखों के लिए हानिकारक हो सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘प्रकाश’ भी विद्युत चुम्बकीय विकिरण का एक रूप होता है। विद्युत चुम्बकीय विकिरण के अन्य रूपों के बारे में जानने हेतु पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम का अवलोकन
  2. पराबैगनी किरणों के बारे में
  3. इनके प्रकार
  4. विशेषताएं

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

नए यूरोपीय जलवायु कानून


संदर्भ:

हाल ही में, यूरोपीय संघ द्वारा कार्बन उत्सर्जन को कम करने और अपने 27 सदस्य देशों से जीवाश्म ईंधन से मुक्त करने के लिए “फिट फॉर 55” (Fit for 55) शीर्षक से विश्व के कुछ सर्वाधिक महत्वाकांक्षी प्रस्तावों को पेश किया गया है।

ये उपाय, वर्ष 2030 तक उत्सर्जन को, वर्ष 1990 के स्तर की तुलना में 55% तक कम करने का अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए यूरोपीय संघ का रोडमैप हैं।

रोडमैप के प्रमुख बिंदु:

  • इस रोडमैप में, पूरे यूरोपीय संघ में परिवहन, निजी और वाणिज्यिक दोनों, को विशेष रूप से लक्षित किया गया है।
  • उदाहरण के लिए, वर्ष 2035 से यूरोपीय संघ में ‘दहन इंजन’ (Combustion Engines) वाली कारों का उत्पादन नहीं किया जाएगा।
  • विमानन और समुद्री परिवहन में पारंपरिक ईंधन के स्थान पर कोई ‘संवहनीय’ विकल्प अपनाने वाले देशों को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।
  • पेट्रोल और गैसोलीन ईंधन पर न्यूनतम करों की दर में महत्वपूर्ण अंतर से वृद्धि की जाएगी, और इसी तरह की टैक्स-दर ‘मिट्टी के तेल’ (केरोसिन) पर भी लागू होगी।

कार्बन सीमा:

  • प्रस्तावित कार्बन सीमा के तहत, समूह के बाहर उत्पादित कुछ वस्तुओं पर उनके ‘कार्बन पदचिह्न’ के आधार पर कर आरोपित किए जाएंगे, जोकि यूरोपीय संघ के भीतर उत्पादित वस्तुओं के लिए मौजूदा मानकों के अधीन होंगे।
  • कार्बन सीमा लागू करने के माध्यम से, यूरोपीय संघ की कंपनियों को, निम्न पर्यावरण मानकों वाले स्थानों से सस्ती सामग्री आयात करने से हतोत्साहित करने की योजना है।

‘यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार प्रणाली’ (ETS) में निर्धारित सीमा को कम करना:

  • वर्ष 2005 में गठित ‘यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार प्रणाली’ (EU Emissions Trading System – ETS) के तहत, यूरोपीय संघ के भीतर ‘कार्बन उत्सर्जक कंपनियों’ पर प्रतिवर्ष उत्पादन करने की एक सीमा निर्धारित की जाती है।
  • यदि कोई कंपनी इस सीमा का उल्लंघन करती है, तो उस पर जुर्माना लगाया जाता है। इसके अलावा, ETS में कोई कंपनी, किसी अन्य कंपनी से, उसके लिए अनुमत्त किंतु अप्रयुक्त ‘उत्सर्जन-भाग’ को खरीद भी सकती है।

लाभ:

  1. सतत आर्थिक विकास को प्रोत्साहन मिलेगा।
  2. रोजगार सृजन होगा।
  3. यूरोपीय संघ के नागरिकों के लिए स्वास्थ्य और पर्यावरणीय लाभ प्राप्त होंगे।
  4. हरित प्रौद्योगिकियों में नवाचार को बढ़ावा देकर यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक वैश्विक प्रतिस्पर्धा में योगदान करेगी।

कार्यान्वयन में चुनौतियां:

  1. यूरोपीय संघ के कुछ सदस्य देश अन्य देशों की तुलना में गरीब हैं, अर्थात, इन देशों के लिए ‘ब्रुसेल्स लक्ष्यों’ के अनुसार परिवर्तन करना मुश्किल होगा। जबकि अन्य सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं उद्योगों पर आधारित हैं, जोकि प्रवृत्ति के अनुसार अधिक उत्सर्जन पैदा करती हैं।
  2. नए यूरोपीय जलवायु कानून लागू करना राजनीतिक रूप से भी कठिन होगा, क्योंकि वर्तमान में, कई सदस्य देश, यूरोप-व्यापी कई अन्य मुद्दों- ‘विधि कि शासन’ से लेकर मानवाधिकारों संबंधी- पर बंटे हुए हैं, और संभवतः जलवायु परिवर्तन पर जारी इस बहस का उपयोग, अन्य विवादों के लिए एक प्रॉक्सी के रूप में करेंगे।
  3. विशेषज्ञों का कहना है, हालांकि इन नीतियों को पहले लागू करना तकनीकी और आर्थिक रूप से संभव है, किंतु, इस रूप में यह ‘ग्रीन डील’, ग्लोबल वार्मिंग को 5C तक सीमित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
  4. इन कानूनों से, यूरोपीय संघ भले ही कार्बन तटस्थ हो जाए, किंतु अन्य विकासशील देशों द्वारा उत्सर्जन में तीव्र वृद्धि होती रहेगी।

इससे पहले, यूरोपीय संघ की ‘जलवायु परिवर्तन’ पर दी गई प्रतिक्रिया:

  • यूरोपीय संघ के देशों द्वारा ‘ग्रीन हाउस गैसों’ के उत्सर्जन को काफी हद तक कम करने हेतु, अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों के लिए बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
  • वर्ष 2017 तक, यूरोपीय संघ द्वारा, वर्ष 1990 की तुलना में, अपने उत्सर्जन में लगभग 22% की कमी की जा चुकी थी, और समूह ने अपने 2020 उत्सर्जन-कटौती लक्ष्य को निर्धारित समय से तीन साल पहले तक हासिल कर लिया था।

‘जलवायु परिवर्तन’ अब वैश्विक चुनौती क्यों बन गया है?

ग्रह की जलवायु में होने वाले वर्तमान परिवर्तनों से पूरी दुनिया में बदलाव हो रहे हैं।

  1. पिछले दो दशकों के दौरान, 18 वर्ष रिकॉर्ड स्तर पर सर्वाधिक गर्म वर्ष रहे हैं, और वनाग्नि, ग्रीष्म-लहरें (हीट वेव्स) और बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाएं, यूरोप और अन्य जगहों पर बार-बार हो रही हैं।
  2. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है, कि यदि तत्काल ही कोई कार्रवाई नहीं की गयी तो, वर्ष 2060 तक ग्लोबल वार्मिंग पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाएगी, और इस सदी के अंत तक, यह 5 डिग्री सेल्सियस तक भी पहुंच सकती है।
  3. वैश्विक तापमान में इस तरह की वृद्धि से प्रकृति पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा, जिससे कई पारिस्थितिक तंत्रों में अपरिवर्तनीय बदलाव होंगे और इसके परिणामस्वरूप जैव विविधता को अपूर्णीय क्षति पहुंचेगी।
  4. उच्च तापमान और तीव्र मौसमी घटनाओं के परिणामस्वरूप यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था के लिए भारी नुकसान पहुंचेगा और देशों की खाद्य उत्पादन क्षमता में बाधा उत्पन्न होगी।

समय की मांग:

जीवाश्म ईंधन से होने वाले वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का लगभग 8% हिस्सा यूरोपीय संघ में उत्पादित होता है। बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने के लिए, विश्व के दो सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देशों- अमेरिका और चीन, सहित अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को भी कड़ी कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप कार्बन फुटप्रिंट’ के बारे में जानते हैं? इसे किस प्रकार मापा जाता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. नए यूरोपीय जलवायु कानून के तहत लक्ष्यों का अवलोकन
  2. यूरोपीय संघ और अन्य विकसित देशों द्वारा शुरू की गयी इस तरह की पहल
  3. पेरिस समझौता क्या है?

मेंस लिंक:

यूरोपीय संघ द्वारा निर्धारित जलवायु लक्ष्यों के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: विभिन्न सुरक्षा बल और संस्थाएँ तथा उनके अधिदेश।

 कर्नाटक पुलिस में ‘अपराध-स्थल अधिकारी’


(‘Scene of crime officers’ in Karnataka police)

संदर्भ:

कर्नाटक सरकार द्वारा पूरे राज्य में 206 ‘अपराध-स्थल अधिकारियों’ (scene of crime officers- SoC officers) की भर्ती करने की योजना बनाई जा रही है।

SoC अधिकारियों के बारे में:

  • ‘अपराध-स्थल अधिकारी’ रैंक में पुलिस सब-इंस्पेक्टर के समकक्ष होगा और वह फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला निदेशालय का हिस्सा होगा।
  • SoC अधिकारी, फोरेंसिक विज्ञान के साथ-साथ अपराध स्थल पर साक्ष्यों की पहचान, संग्रह और संरक्षण करने में विशेषज्ञ होंगे।
  • ये अधिकारी प्रशिक्षित अन्वेषक होंगे, जिनके लिए गुजरात के गांधीनगर में राष्ट्रीय फोरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय और हैदराबाद में ‘केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला’ में प्रशिक्षण दिया जाएगा।
  • पुलिस विभाग की शुरुआती योजना के अनुसार, सभी जिलों में एक एसओसी (SoC) यूनिट गठित की जाएगी होगी और इनमे चार से पांच एसओसी अधिकारी तैनात किए जाएंगे।

महत्व:

  • कर्नाटक पुलिस के अनुसार, साक्ष्य संग्रह के लिए देश में पहली बार समर्पित अधिकारियों को तैनात किया जाएगा। अभी तक यह पद्धति विकसित देशों में ही प्रचलित है।
  • वर्ष 1961 में, ‘क्राइम सीन ऑफिसर का पद’ पहली बार लंदन में सृजित किया गया था।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत ‘पुलिस’ और ‘लोक व्यवस्था’ राज्य के अधीन विषय हैं। सातवीं अनुसूची के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़ें

 

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


कांवड़ यात्रा

यह हिंदू कैलेंडर के अनुसार, श्रावण (सावन) माह में की जाने वाली एक तीर्थयात्रा है।

  • इस यात्रा में, भगवाधारी शिव भक्त आमतौर पर गंगा या अन्य पवित्र नदियों से पवित्र जल का घड़ा भरकर नंगे पाँव यात्रा करते हैं। तीर्थयात्री इस जल को महत्वपूर्ण मंदिरों में शिव लिंग पर चढाते हैं।
  • पवित्र जल के घड़े को भक्त अपने कंधों पर एक सजी हुई कांवर में ले जाते हैं।
  • गंगा के मैदानी इलाकों में उत्तराखंड के हरिद्वार, गौमुख और गंगोत्री, बिहार के सुल्तानगंज और उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, अयोध्या या वाराणसी जैसे तीर्थ स्थलों से पवित्र जल घड़ों में भरा जाता है।
  • उत्तर भारत की कांवड़ यात्रा की भांति दक्षिण भारत के तमिलनाडु में एक महत्वपूर्ण त्योहार ‘कावड़ी उत्सव’ मनाया जाता है। ‘कावड़ी उत्सव में ‘भगवान मुरुगन’ की पूजा की जाती है।

की समानता वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार, जिसे कावड़ी उत्सव कहा जाता है, तमिलनाडु में मनाया जाता है, जिसमें भगवान मुरुगा की पूजा की जाती है।

 

कोंगु नाडु

(Kongu Nadu)

कोंगु नाडु (Kongu Nadu) आमतौर पर, पश्चिमी तमिलनाडु क्षेत्र के हिस्से के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला नाम है। यह न तो पिन कोड वाला स्थान है और न ही किसी क्षेत्र को औपचारिक रूप से दिया नाम है।

तमिल साहित्य में, इसे प्राचीन तमिलनाडु के पांच क्षेत्रों में से एक के रूप में संदर्भित किया गया था।

संगम साहित्य में ‘कोंगु नाडु’ का एक अलग क्षेत्र के रूप में उल्लेख किया गया है।

यह नाम तमिलनाडु के एक ओबीसी समुदाय ‘कोंगु वेल्लाला गौंडर’ (Kongu Vellala Gounder) से लिया गया है,  जिसकी राज्य के इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपस्थिति है।

 

केमोटैक्सिस

(Chemotaxis)

सूक्ष्मजैविकी में ‘केमोटैक्सिस’ (Chemotaxis), कोशिकाओं के ‘आकर्षी रसायनों’ (attractant chemicals) की ओर प्रवास करने या विकर्षकों (repellents) से दूर जाने को संदर्भित करता है।

  • कायिक कोशिकाएं (Somatic cells), बैक्टीरिया और अन्य एकल-कोशिकायें या बहुकोशिकीय जीव, अपने वातावरण में मौजूद कुछ रसायनों के अनुसार अपनी गतिविधियां करते हैं।
  • ‘केमोटैक्सिस’ क्रियाएं, जीवाणुओं के लिए भोजन की खोज में, जैसेकि ‘ग्लूकोज’ की उच्चतम सांद्रता की ओर जाना, या जहर (जैसे कि ‘फिनोल’) से बचने हेतु दूर भागने के लिए महत्वपूर्ण होती है।

Join our Official Telegram Channel HERE for Motivation and Fast Updates

Subscribe to our YouTube Channel HERE to watch Motivational and New analysis videos

Leave a Comment