INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 21 June 2021

[ad_1]

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-I

1. ग्रीष्म संक्रांति

सामान्य अध्ययन-II

1. एकीकृत विद्युत विकास योजना (IPDS)

2. इबोला प्रकोप

3. संयुक्त राष्ट्र में ‘म्यांमार संबंधी प्रस्ताव’ पर मतदान

सामान्य अध्ययन-III

1. मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़

2. अवैध एचटीबीटी कपास के बीजों की बिक्री दोगुनी

3. हबल स्पेस टेलीस्कोप

4. हरित हाइड्रोजन पहल पर शिखर सम्मेलन

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. भारत का राष्ट्रीय इंटरनेट एक्सचेंज (NIXI)

2. बायोटेक-किसान कार्यक्रम

3. अजीत मिश्रा विशेषज्ञ समूह


सामान्य अध्ययन- I


विषय: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ और उनके स्थान।

 ग्रीष्म संक्रांति


(Summer solstice)

संदर्भ:

21 जून को ‘ग्रीष्मकालीन अयनांत’ / ग्रीष्म संक्रांति (Summer Solstice) भी कहा जाता है। यह ग्रीष्म ऋतु का सबसे लंबा दिन होता है। ग्रीष्म संक्रांति के दिन सूर्य की अवस्थिति कर्क रेखा (Tropic of Cancer) के ठीक ऊपर होती है।

कारण:

लैटिन भाषा में ‘सॉल्स्टिस’ (Solstice) का अर्थ ‘सूर्य की स्थिर अवस्था’ (sun stands still) होता है।

संक्रांति या ‘अयनांत’, पृथ्वी के अपनी धुरी पर झुकाव और सूर्य के चारों ओर कक्षा में परिक्रमण करने के दौरान घटित होने वाली एक खगोलीय घटना है।

जून संक्रांति के दिन, पृथ्वी अपनी कक्षा में इस प्रकार अवस्थित होती है, कि हमारे विश्व का उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर सर्वाधिक झुक जाता है।

पृथ्वी से देखने पर, दोपहर के वक्त सूर्य, भूमध्य रेखा के उत्तर में स्थित कर्क रेखा के के ठीक ऊपर होता है। कर्क रेखा, 23 ½ डिग्री उत्तरी अक्षांश पर ग्लोब के चारो और वृत्त बनाती हुई एक काल्पनिक रेखा है- इसका नामकरण ‘कर्क नक्षत्र’ (constellation Cancer the Crab) के ऊपर किया गया है। यह सूर्य की अधिकतम उत्तर की स्थिति पर स्थित होती है, अर्थात सूर्य इस रेखा आगे उत्तर दिशा में नहीं जाता है।

निहितार्थ:

  1. भूमध्य रेखा के उत्तर में सभी जगहों पर जून संक्रांति के अवसर पर दिन की अवधि 12 घंटे से अधिक होती है। जबकि इसी दौरान, भूमध्य रेखा के दक्षिण में सभी स्थानों पर दिन की अवधि 12 घंटे से कम होती है।
  2. इस दिन, पृथ्वी पर सूर्य से अधिक मात्रा में ऊर्जा प्राप्त होती है। नासा के अनुसार, इस दिन पृथ्वी को सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा की मात्रा, भूमध्य रेखा की तुलना में, उत्तरी ध्रुव पर 30 प्रतिशत अधिक होती है।

‘शीतकालीन संक्रांति’ क्या है?

‘शीतकालीन अयनांत’ या ‘शीतकालीन संक्रांति’ (Winter Solstice) की परिघटना 21 दिसंबर को होती है, और यह उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे छोटा दिन होता है।

  • ‘शीतकालीन संक्रांति’ पर उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात होती है और इसे उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों का पहला दिन’ और ‘हैमल सॉल्स्टिस’ (Hiemal solstice) या शिशरी सक्रांति / ‘हाइबरनल सॉल्स्टिस’ (Hibernal solstice) के रूप में भी जाना जाता है।
  • इस समय, उत्तरी गोलार्ध में स्थित देशों की सूर्य से दूरी सर्वाधिक होती है, और सूर्य की अवस्थिति 5° दक्षिणी अक्षांश पर स्थित ‘मकर रेखा’ (Tropic of Capricorn) के ठीक ऊपर होती है।

इंस्टा जिज्ञासु:

जून संक्रांति के लगभग दो सप्ताह बाद, पृथ्वी और सूर्य के मध्य दूरी अधिकतम हो जाती है। इस दौरान ‘अपसौर’ की परिघटना होती है। क्या आप जानते हैं कि उपसौर और अपसौर (Perihelion and Aphelion) क्या होते हैं? यहां पढ़ें,

प्रीलिम्स लिंक:

  1. संक्रांति क्या होती है?
  2. ग्रीष्म और शीतकालीन संक्रांति के बीच अंतर।
  3. कर्क रेखा पर अवस्थित देश
  4. मकर रेखा
  5. उपसौर और अपसौर

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


सामान्य अध्ययन- II


विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

एकीकृत विद्युत विकास योजना (IPDS)


(Integrated Power Development Scheme)

संदर्भ:

हाल ही में, भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय की ‘एकीकृत विद्युत विकास योजना’ (इंटीग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम) के तहत हिमाचल प्रदेश के सोलन में 50  किलोवॉट पॉवर क्षमता के सोलर रूफ टॉप प्लांट का उद्घाटन किया गया।

यह परियोजना भारत सरकार की ‘शहरी वितरण योजना’ में परिकल्पित सरकार की ‘गो ग्रीन’ (Go Green) पहल को और सुदृढ़ करेगी।

एकीकृत विद्युत विकास योजना (IPDS) के बारे में:

पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन (PFC), इस योजना के कार्यान्वयन हेतु नोडल एजेंसी है।

इंटीग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम (IPDS) की शुरुआत वर्ष 2014 में विद्युत मंत्रालय द्वारा की गई थी। इस योजना के उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  1. शहरी क्षेत्रों में सब-ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क को मजबूत करना।
  2. शहरी क्षेत्रों में वितरण ट्रांसफार्मर/फीडर/उपभोक्ताओं के लिए मीटर लगाना।
  3. पुनर्गठित त्‍वरित विद्युत विकास एवं सुधार कार्यक्रम (R-APDRP) के तहत वितरण क्षेत्र को आईटी सक्षम करना तथा वितरण नेटवर्क को मजबूत करना।

योजना का महत्व:

यह योजना AT&C घाटे को कम करने में मदद, आईटी सक्षम विद्युत् लेखा/ ऑडिट प्रणाली की स्थापना, मीटर खपत के आधार पर विद्युत्-भुगतान में सुधार तथा संग्रह दक्षता में सुधार करेगी।

पुनर्गठित त्‍वरित विद्युत विकास एवं सुधार कार्यक्रम (R-APDRP):

(Restructured Accelerated Power Development and Reforms Programme)

यह कार्यक्रम सितंबर, 2008 में विद्युत मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया था। इसे स्थापित करने का प्रमुख ध्येय ग्यारहवीं योजना के दौरान सब-ट्रांसमिशन एवं वितरण नेटवर्क को मजबूत एवं अपग्रेड करके इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी को अपनाते हुए बेसलाइन डाटा की स्थापना, ज़िम्मेदारी का निर्धारण एवं एटीएंडसी हानियों को 15 प्रतिशत तक कम करना है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि ‘नेशनल ग्रिड’ का स्वामित्व, संचालन और रखरखाव राज्य के स्वामित्व वाली ‘पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया’ द्वारा किया जाता है? इसके बारे में यहाँ और पढ़ें,

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आईपीडीएस के बारे में।
  2. R-APDRP के बारे में।
  3. ’नेशनल ग्रिड’ क्या है?
  4. AT&C नुकसान क्या होते हैं?

मेंस लिंक:

आईपीडीएस के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

इबोला का प्रकोप


(Ebola outbreak)

संदर्भ:

पश्चिम अफ़्रीका में स्थित देश ‘गिनी गणराज्य’ में  इसी वर्ष फरवरी में फैले इबोला प्रकोप (Ebola outbreak) को, हाल ही में, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने समाप्त घोषित कर दिया है। इस बार फैले इबोला प्रकोप से ‘गिनी’ में 16 लोग संक्रमित हुए और 12 लोगों की मौत हुई थी।

पृष्ठभूमि:

  • वर्ष 2014-2016 में इबोला प्रकोप से 11,300 लोगों की मौत हुई थी। इनमे से अधिकाँश मौते गिनी, सिएरा लियोन और लाइबेरिया में हुई।
  • मई 2021 में, ‘कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य’ (DRC) ने आधिकारिक तौर पर अपने देश में 12वें इबोला प्रकोप के अंत की घोषणा कर दी थी।

‘इबोला’ के बारे:

इबोला विषाणु रोग (Ebola virus disease– EVD), मनुष्यों में फैलने वाली एक घातक बीमारी है। इसके लिए पहले ‘इबोला रक्तस्रावी बुखार’ (Ebola haemorrhagic fever) के रूप में जाना जाता था।

इबोला का प्रसरण: यह विषाणु, वन्यजीवों से मनुष्यों में फैलता है और फिर मानव आबादी में मानव-से-मानव संचरण के माध्यम से फैलता है।

औसतन इबोला विषाणु रोग (EVD) मामलों में मृत्यु दर लगभग 50% होती है। इस बीमारी के पिछले प्रकोपों ​​के दौरान संक्रमित मामलों में मृत्यु दर 25% से 90% तक परिवर्तित होती रही है।

निवारण / रोकथाम: इस बीमारी के प्रकोप को सफलतापूर्वक नियंत्रित करने के लिए सामुदायिक भागीदारी अति महत्वपूर्ण है। प्रकोप पर अच्छे तरीके से नियंत्रण, संक्रमित मामलों का प्रबंधन, निगरानी और संपर्क में आने वाले लोगों की पहचान करना, उपयुक्त प्रयोगशाला सेवाएँ, और सामाजिक जागरूकता पर निर्भर करता है।

उपचार: पुनर्जलीकरण (rehydration) सुविधा प्रदान करने के साथ-साथ प्रारंभिक सहायक देखभाल और लाक्षणिक उपचार, रोगी के जीवित रहने में अवसरों में सुधार करता है। अभी तक, इस विषाणु को निष्प्रभावी करने के कोई भी प्रमाणिक उपचार उपलब्ध नहीं है। हालांकि, रक्त- चिकित्सा, प्रतिरक्षा और ड्रग थेरेपी आदि रोगोपचार विकसित किए जा रहे हैं।

Ebola

इंस्टा जिज्ञासु:

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (मध्य अफ्रीका में स्थित एक देश) में इबोला के प्रकोप को वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में घोषित किया गया था। क्या आप जानते हैं कि वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल को किस प्रकार परिभाषित किया जाता है? Click here

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘इबोला’ बीमारी किस प्रकार फैलती है?
  2. ‘ज़ूनोटिक रोग’ क्या होते हैं?
  3. वायरस, बैक्टीरिया और अन्य रोगजनकों के मध्य अंतर
  4. ‘कांगो’ की अवस्थिति?
  5. इबोला प्रकोप से ग्रसित होने वाले अफ्रीकी क्षेत्र?

मेंस लिंक:

कांगो गणराज्य में इबोला प्रकोप पर किस प्रकार नियंत्रण पाया गया? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

संयुक्त राष्ट्र में ‘म्यांमार संबंधी प्रस्ताव’ पर मतदान


संदर्भ:

हाल ही में, भारत ने ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा’ (UNGA) में म्यांमार के खिलाफ शस्त्र प्रतिबंध लगाए जाने संबंधी प्रस्ताव पर होने वाले मतदान में भाग नहीं लिया।

इस प्रस्ताव के पक्ष में 119 देशों ने मतदान किया जबकि म्‍यांमार के पड़ोसी देश भारत, बांग्लादेश, भूटान, चीन, नेपाल, थाईलैंड और लाओस समेत 36 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। बेलारूस एकमात्र ऐसा देश था जिसने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया।

भारत द्वारा मतदान में भाग नहीं लेने का कारण:

  1. भारत का कहना है, कि ‘महासभा’ द्वारा पारित किए जाने से पहले ‘मसौदा प्रस्ताव’ में हमारे विचार प्रतिबिंबित होते प्रतीत नहीं हो रहे थे।
  2. भारत का मानना है, कि इस प्रस्ताव को इस समय स्वीकृत करना ‘म्‍यांमार में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में हमारे संयुक्त प्रयासों के लिए अनुकूल नहीं है’।

संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के बारे में:

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने म्‍यांमार की सैन्य सरकार के खिलाफ व्यापक वैश्विक विरोध प्रकट करते हुए एक प्रस्ताव पारित कर देश में सैन्य तख्तापलट की निंदा की है।

  • साथ ही प्रस्ताव में, म्‍यांमार के खिलाफ शस्त्र प्रतिबंध का आह्वान किया है और लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को बहाल करने की मांग की है।
  • प्रस्ताव में, म्यांमार के सशस्त्र बलों से 8 नवंबर, 2020 को हुए आम चुनाव के परिणामों द्वारा स्वतंत्र रूप से व्यक्त की गई लोगों की इच्छा का सम्मान करने की मांग की गई है।

भारत द्वारा म्यांमार के संदर्भ में ‘आसियान’ द्वारा की जा रही एक पहल तथा पांच सूत्रीय सहमति’ का समर्थन किया जा रहा है:

इसमें शामिल है:

  1. हिंसा पर तत्काल रोक
  2. शांतिपूर्ण समाधान हेतु म्यांमार में सभी हितधारकों के बीच संवाद
  3. मध्यस्थता हेतु एक विशेष आसियान प्रतिनिधि की नियुक्ति
  4. म्यांमार के लिए सहायता प्रदान करना
  5. आसियान प्रतिनिधि द्वारा म्यांमार का दौरा

म्यांमार के हालातों पर भारत को क्यों चिंतित होना चाहिए?

  • भारत के लिए, म्यांमार की स्थिति के संदर्भ में काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है, क्योंकि म्यांमार के भीतर अस्थिरता का माहौल बने रहने से पूर्वोत्तर क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
  • म्यांमार में गुरिल्ला समूहों / छापामार संगठनों द्वारा अपनी गतिविधियों को फिर से शुरू करने के संबंध में खबरें मिल रही हैं, और देश में कानून और व्यवस्था के भंग होने से पूर्वोत्तर भारत में आतंकवादी समूहों को मौके का लाभ उठाने का अवसर मिल जाएगा।

म्यांमार में हो रही हालिया घटनाएँ:

इसी वर्ष 1 फरवरी को, म्यांमार की सेना ने नोबेल पुरस्कार विजेता ‘आंग सान सू की’ की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के खिलाफ तख्तापलट कर दिया था। सेना ने पिछले साल नवंबर में हुए चुनावों में ‘आंग सान सू की’ की सत्ताधारी पार्टी पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया था।

हालांकि, सेना द्वारा लगाए गए इस आरोप को देश के पिछले चुनाव आयोग और अंतरराष्ट्रीय निगरानीकर्ताओं ने खारिज कर दिया है।

भारत की अगली प्रतिक्रिया:

भारत की प्रतिक्रिया इस बार अलग होने की संभावना है। भारत म्यांमार में लोकतंत्र की परवाह करता है और इसका महत्व जानते हुए भी वह सैन्य तख्तापलट का विरोध करने का जोखिम नहीं उठा सकता है। क्योंकि:

  • म्यांमार की सेना के साथ भारत के सुरक्षा संबंध काफी प्रगाढ़ हो चुके हैं, और भारत के लिए, उत्तर पूर्वी सीमाओं को विद्रोही समूहों से सुरक्षित करने में म्यांमार सेना की सहायता की जरूरत को देखते हुए ‘संबंधों के पुल’ को जलाना मुश्किल होगा।
  • ‘आंग सान सू की’ की छवि में बदलाव: लोकतंत्र की प्रतीक और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता के रूप में सुश्री ‘सू की’ की छवि उनके कार्यकाल के दौरान काफी धूमिल हो चुकी है। वर्ष 2015 में अपने कार्यकाल में सुश्री ‘सू की’ सेना रखाइन राज्य में रोहिंग्या समुदाय पर नृशंसता करने से रोकने में विफल रहीं और उन्होंने इस मामले से सेना का बचाव भी किया था।
  • चीन के लिए लाभ: अमेरिका की तरह भारत की कठोर प्रतिक्रिया से मुख्यतः चीन को लाभ होगा। अमेरिका ने, सेना द्वारा किये गए कब्जे को समाप्त नहीं करने पर, “तख्तापलट” के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की धमकी दी है।
  • रणनीतिक चिंताओं के अलावा, भारत ने म्यांमार में कई अवसंरचना एवं विकास परियोजनाओं में निवेश किया है। भारत इन परियोजनाओं के लिए ‘आसियान देशों तथा पूर्व के प्रवेश द्वार’ के रूप में देखता है (उदाहरणार्थ: भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान बहु-मोडल पारगमन परिवहन नेटवर्क, सीटवे डीप वाटर पोर्ट (Sittwe deep-water port) पर एक विशेष आर्थिक क्षेत्र परियोजना)।
  • इसके अलावा, भारत के लिए अभी भी बांग्लादेश में पलायन करने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे को सुलझाने में मदद करने की उम्मीद है, और इस विषय पर म्यांमार सरकार से वार्ता जारी रखना चाहेगा। भारत में भी कुछ रोहिंग्या शरणार्थियों ने पलायन किया है।

म्यांमार का सैन्य संविधान:

म्यांमार में सेना द्वारा वर्ष 2008 में एक संविधान का मसौदा तैयार किया गया था, और इसी वर्ष अप्रैल में इस पर संदेहास्पद जनमत संग्रह कराया गया था।

  • यह संविधान, सेना द्वारा तैयार किया गया ‘लोकतंत्र का रोडमैप’ था, जिसे सेना ने पश्चिमी देशों के दबाव के कारण निर्मित किया था।
  • इसके अलावा, सैन्य शासन के लिए यह अहसास भी हो चुका था कि म्यांमार को बाहरी दुनिया के लिए खोलना अब एक विकल्प नहीं बल्कि एक गंभीर जरूरत भी है।
  • लेकिन सेना ने संविधान में अपनी भूमिका और राष्ट्रीय मामलों में वर्चस्व को सुनिश्चित कर लिया था।
  • संविधान के प्रावधानों के तहत, संसद के दोनों सदनों में 25 प्रतिशत सीटें सेना के लिए आरक्षित की गयी है, जिन पर सैन्य अधिकारियों को नामित किया जाता है।

साथ ही, एक प्रतिनिधि राजनीतिक दल का गठन किया गया जो सेना की ओर से चुनावों में भाग लेता है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में कोई भी निर्णय किस प्रकार लिए जाते हैं? यहां पढ़ें, 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. म्यांमार के बारे में
  2. इसका संविधान
  3. भारतीय संविधान से तुलना
  4. UNGA के बारे में
  5. संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न संगठन

मेंस लिंक:

पड़ोसी देशों के प्रति भारत की नीति पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू


सामान्य अध्ययन- III


विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़


संदर्भ:

हाल ही में, REGEN-COV2 नामक एक प्रायोगिक ‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडी’ (Monoclonal Antibody) कॉकटेल को कोविड -19 से प्रभावित कुछ काफी गंभीर रोगियों के लिए एक जीवन रक्षक उपचार के रूप में पाया गया है। ब्रिटेन में किए गए एक नैदानिक ​​​​परीक्षण में इस तरह के परिणाम देखे गए हैं।

हालांकि, इस तरह के उपचार काफी महंगे होते हैं क्योंकि इनको निर्मित करना मुश्किल होता है और इसमें बहुत समय लगता है।

‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडी’ क्या होती हैं?

मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (Monoclonal antibodies- mAbs) कृत्रिम रूप से निर्मित एंटीबॉडी होती हैं, जिनका उद्देश्य शरीर की ‘प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली’ की सहायता करना होता है।

ये  एक विशेष एंटीजन को लक्षित करती हैं। यह विशेष एंटीजन, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया प्रेरित करने वाले रोगाणु का ‘प्रोटीन’ होता है।

‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडी’ किस प्रकार निर्मित की जाती हैं?

प्रयोगशाला में, श्वेत रक्त कोशिकाओं को एक विशेष एंटीजन के संपर्क में लाने पर ‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़’ का निर्माण किया जा सकता है।

  • ‘एंटीबॉडीज़’ को अधिक मात्रा में निर्मित करने के लिए, एकल श्वेत रक्त कोशिका का प्रतिरूप (Clone) बनाया जाता है, जिसे एंटीबॉडी की समरूप प्रतियां तैयार करने में प्रयुक्त किया जाता है।
  • कोविड -19 के मामले में, मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़’ तैयार करने के लिए वैज्ञानिक प्रायः SARS-CoV-2 वायरस के स्पाइक प्रोटीन का उपयोग करते है। यह ‘स्पाइक प्रोटीन’ मेजबान कोशिका में वायरस को प्रविष्ट कराने में सहायक होता है।

‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़’ की आवश्यकता:

एक स्वस्थ शरीर में, इसकी ‘प्रतिरक्षा प्रणाली’ (Immune System), एंटीबॉडीज़ अर्थात ‘रोग-प्रतिकारकों का निर्माण करने में सक्षम होती है।

  • ये एंटीबॉडीज़, हमारे रक्त में वाई-आकार (Y-shape) के सूक्ष्म प्रोटीन होते हैं, जो सूक्ष्मजीव रोगाणुओं की पहचान करके उन्हें जकड़ लेते हैं तथा प्रतिरक्षा प्रणाली को इन रोगाणुओं पर हमला करने का संकेत करते है।
  • यद्यपि, जिन लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली, इन एंटीबॉडीज़ को पर्याप्त मात्रा में निर्मित करने में असमर्थ होती हैं, उनकी सहायता के लिए वैज्ञानिकों द्वारा ‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़’ की खोज की गई है।

इतिहास:

किसी बीमारी के इलाज के लिए एंटीबॉडी दिए जाने का विचार 1900 के दशक प्रचलित हुआ था, जब  नोबेल पुरस्कार विजेता जर्मन प्रतिरक्षा विज्ञानी (Immunologist) ‘पॉल एर्लिच’ (Paul Ehrlich) द्वारा जाबरक्युग्ल’ (Zauberkugel) अर्थात ‘मैजिक बुलेट’ का विचार प्रतिपादित किया गया था। ‘जाबरक्युग्ल’, चुनिंदा रूप से किसी रोगाणु को लक्षित करने वाला योगिक है।

  • तब से, मानवों में नैदानिक ​​उपयोग हेतु स्वीकृत होने वाली विश्व की पहली मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, ‘म्युरोमोनाब-सीडी3 (Muromonab-CD3) तैयार होने तक आठ दशकों का समय लगा।
  • ‘म्युरोमोनाब-सीडी3’, एक प्रतिरक्षादमनकारी (Immunosuppressant) दवा है। इसे ‘अंग प्रत्यारोपण’ किए गए रोगियों में तीव्र अस्वीकृति (Acute Rejection) को कम करने के लिए दी जाती है।

अनुप्रयोग:

मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ अब अपेक्षाकृत आम हो चुकी हैं। इनका उपयोग इबोला, एचआईवी, त्वचा-रोगों (psoriasis) आदि के इलाज में किया जाता है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप पॉलीक्लोनल एंटीबॉडी के बारे में जानते हैं? उनके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करें:  Click here

CRISPR-Cas9 क्या है? Read here

प्रीलिम्स लिंक:

  1. एंटीबॉडीज़ क्या होती हैं?
  2. मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ क्या होती हैं?
  3. ये किस प्रकार निर्मित की जाती हैं?
  4. अनुप्रयोग
  5. एंटीजन बनाम एंटीबॉडी

मेंस लिंक:

मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ क्या होती हैं? इनके महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

अवैध एचटीबीटी कपास के बीजों की बिक्री दोगुनी


(Sale of illegal HTBt cotton seeds doubles)

संदर्भ:

हाल ही में, उद्योग लॉबी ने आनुवंशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified) कपास की खेती के गंभीर पर्यावरणीय और आर्थिक परिणामों को देखते हुए, कृषि मंत्रालय को पत्र लिखकर ‘हर्बिसाइड टॉलरेंट (एचटी) बीटी कपास’ (HTBt cotton) की अवैध बिक्री को रोकने के लिए कार्रवाई करने तथा अपराधियों को दंडित करने की मांग की गई है।

संबंधित प्रकरण:

हर्बिसाइड टोलरेंट बीटी (एचटी बीटी) (Herbicide Tolerant – HTBt) कपास की अवैध खेती में इस साल भारी उछाल देखा गया है।

बीज निर्माताओं का दावा है, कि एचटीबीटी कपास के अवैध बीज पैकेटों की बिक्री पिछले साल के 30 लाख से बढ़कर इस साल 75 लाख तक पहुँच गई है।

भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के लिए अनुमति:  

बीटी कपास (Bt cotton) देश में एकमात्र ‘आनुवंशिक रूप से संशोधित’ फसल (Genetically Modified- GM crop) है, जिसकी खेती के लिए अनुमति दी गई है।

  • बीटी कपास को एक अमेरिकी दिग्गज कंपनी ‘बेयर-मोनसेंटो’ (Bayer-Monsanto) द्वारा विकसित किया गया था।
  • इसे विकसित करने के लिए ‘बैसिलस थुरियनजीनिसस’ (Bacillus thuringiensis) नामक जीवाणु के दो जीनों ‘क्राई1एबी’ (Cry1Ab) और ‘क्राई2बीसी’ (Cry2Bc) का कपास के बीज में अंतर्वेशन कराया जाता है। बैसिलस थुरियनजीनिसस जीवाणु को मृदा से प्राप्त किया जाता है।
  • यह संशोधन, पौधे को ‘हेलियोथिस बोलवर्म’ (गुलाबी सुंडी) को मारने के लिए विषाक्त प्रोटीन उत्पन्न करने को कूटबद्ध करता है और पौधों को इन कीटों के हमले के प्रति प्रतिरोधी बनाता है। कपास की इस संकर-नस्ल को व्यावसायिक रूप से उत्पादित करने के लिए सरकार द्वारा 2002 में मंजूरी दी गई थी।

‘एचटीबीटी कॉटन’ क्या है?

  • इस किस्म (HtBt) में मृदा से प्राप्त एक अन्य जीवाणु, एग्रोबैक्टीरियम टूमफेशियन्स (Agrobacterium tumefaciens) के एक अन्य जीन, ‘Cp4-Epsps’ का संकरण कराया जाता है।
  • किसानों का दावा है, कि कपास की एचटीबीटी किस्म, ग्लाइफोसेट (glyphosate) के स्प्रे का सामना कर सकती है, और इससे उनके लिए खरपतवार निकालने में लगने वाली लागत काफी कम हो जाती है। ‘ग्लाइफोसेट’ खरपतवार-नाशक एक दवा होती है।

एचटीबीटी कपास से संबंधित मुद्दे:

  • एचटीबीटी कपास के बीजों की अवैध बिक्री में बीज-गुणवत्ता की कोई जवाबदेही नहीं है तथा यह पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं।
  • बीजों की अवैध बिक्री से, वैध रूप से बीज बिक्री करने वाले उद्योगों का घटा हो रहा है, जिससे सरकार के कर संग्रह में राजस्व का भी नुकसान होता है।

संबंधित वैधानिक प्रावधान:

  • कानूनी रूप से, गैर-अनुमोदित जीएम बीजों की बिक्री, भंडारण, परिवहन और उपयोग, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1989 के नियमों के तहत एक दंडनीय अपराध है।
  • सके अलावा, गैर-अनुमोदित बीजों की बिक्री पर 1966 के बीज अधिनियम और 1957 के कपास अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन करने पर पांच साल की जेल और 1 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है, तथा अन्य दो अधिनियमों के तहत मामले दर्ज किए जा सकते हैं।

इंस्टा जिज्ञासु:

भारत में, यह पर्यावरण मंत्रालय के तहत जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (GEAC) की जिम्मेदारी है, कि वह आनुवंशिक रूप से संशोधित पौधे से संबंधित सुरक्षा का आकलन करे, और यह तय करे कि यह खेती के लिए उपयुक्त है अथवा नहीं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. बीटी कॉटन के बारे में
  2. एचटीबीटी कॉटन क्या है?
  3. GEAC क्या है?
  4. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1989 के नियम।
  5. बीज अधिनियम 1966
  6. कपास अधिनियम 1957

मेंस लिंक:

जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (GEAC) के कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

हबल स्पेस टेलीस्कोप


(Hubble Space Telescope)

संदर्भ:

हाल ही में, नासा द्वारा ‘हबल स्पेस टेलीस्कोप’ (Hubble Space Telescope) में खराबी आने के बारे में जानकारी दी गई है। एक पेलोड कंप्यूटर में समस्या आने से इस टेलिस्कोप ने पिछले कुछ दिनों से काम करना बंद कर दिया है।

पृष्ठभूमि:

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने बताया कि हबल के इसी कंप्‍यूटर की मदद से विज्ञान से जुड़े उपकरणों को नियंत्रित किया जाता था।

‘हबल स्पेस टेलीस्कोप’ के बारे में:

  1. हबल स्पेस टेलीस्कोप (HST) अंतरिक्ष में स्थापित एक विशाल दूरबीन है। हबल टेलीस्कोप को नासा द्वारा वर्ष 1990 में लॉन्च किया गया था।
  2. इसे ‘यूरोपियन स्पेस एजेंसी’ (ESA) के सहयोग से नासा (NASA) द्वारा निर्मित किया गया था।
  3. हबल एकमात्र ऐसा टेलीस्कोप है, जिसकी अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा अंतरिक्ष में मरम्मत की जा सकती है।
  4. दृश्यमान ब्रह्मांड की सीमाओं का पार करते हुए, हबल स्पेस टेलीस्कॉप अपने कैमरों के माध्यम से अंतरिक्ष में गहराई तक अवलोकन करता है। ये कैमरे, अवरक्त (infrared) से लेकर पराबैगनी (ultraviolet) तक संपूर्ण प्रकाश वर्णक्रम (optical spectrum) को देखने में सक्षम हैं।
  5. हबल स्पेस टेलीस्कोप प्रत्येक 95 मिनट में पृथ्वी की एक परिक्रमा करता है।

उपलब्धियां:

  1. हबल स्पेस टेलीस्कोप ने प्लूटो के चारो और चंद्रमाओं की खोज करने में मदद की है।
  2. हबल द्वारा किए गए प्रेक्षणों के आधार पर ब्लैक होल के अस्तित्व के बारे में साक्ष्य सामने आए हैं।
  3. इसके द्वारा गैस और धूल के उग्र बादलों को पार करते हुए तारों का उत्पन्न होना भी देखा गया है।
  4. हबल टेलिस्कोप ने छह आकाशगंगाओं का आपस में विलय होने का भी प्रेक्षण किया।
  5. 11 फरवरी, 2021 को हबल ने ब्लैक होल के एक छोटे समूहन के बारे में जानकारी दी थी।

इंस्टा जिज्ञासु:

इस वर्ष के अंत तक ‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ नामक एक नया और अधिक शक्तिशाली टेलिस्कोप तैनात किया जाएगा। इसके बारे में अधिक जानने हेतु देखें:  

प्रीलिम्स लिंक:

  1. हबल स्पेस टेलीस्कोप के बारे में
  2. जेम्स वेब टेलीस्कोप के बारे में
  3. ब्लैक होल क्या है?

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

हरित हाइड्रोजन पहल पर शिखर सम्मेलन


(Summit on Green Hydrogen Initiatives)

संदर्भ:

भारत ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर ‘हरित हाइड्रोजन पहल’ (Green Hydrogen Initiatives) पर एक शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है।

  • यह कार्यक्रम अपनी ग्रीन हाइड्रोजन पहलों और विचारों को साझा करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।
  • इस सम्मेलन के जरिये इन देशों को यह भी जानने का अवसर मिलेगा कि कैसे वे इस पहल को अपने देश में अगले स्तर पर ले जा सकते हैं।
  • इस कार्यक्रम का संचालन विद्युत मंत्रालय के अधीन महारत्न का दर्जा प्राप्त, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी NTPC लिमिटेड द्वारा किया जाएगा।

हरित हाइड्रोजन / ग्रीन हाइड्रोजन क्या होता है?

नवीकरणीय / अक्षय ऊर्जा का उपयोग करके ‘विद्युत अपघटन’ (Electrolysis) द्वारा उत्पादित हाइड्रोजन को ‘हरित हाइड्रोजन’ (Green Hydrogen) के रूप में जाना जाता है। इसमें कार्बन का कोई अंश नहीं होता है।

ग्रीन हाइड्रोजन का महत्व:

  • भारत के लिए अपने ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (Nationally Determined Contribution- INDC) लक्ष्यों को पूरा करने तथा क्षेत्रीय और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा, पहुंच और उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ ऊर्जा काफी महत्वपूर्ण है।
  • ग्रीन हाइड्रोजन, ऊर्जा भंडारण विकल्प के रूप में कार्य कर सकता है, जो भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा के अंतराल को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
  • गतिशीलता के संदर्भ में, शहरों के भीतर या राज्यों के मध्य लंबी दूरी की यात्रा या माल ढुलाई के लिए, रेलवे, बड़े जहाजों, बसों या ट्रकों आदि में ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग किया जा सकता है।

ग्रीन हाइड्रोजन के अनुप्रयोग:

  1. अमोनिया और मेथनॉल जैसे हरित रसायनों का उपयोग सीधे मौजूदा ज़रूरतों जैसे उर्वरक, गतिशीलता, बिजली, रसायन, शिपिंग आदि में किया जा सकता है।
  2. व्यापक स्वीकृति प्राप्त करने के लिए CGD नेटवर्क में 10 प्रतिशत तक ग्रीन हाइड्रोजन मिश्रण को अपनाया जा सकता है।

लाभ:

  • यह एक स्वच्छ दहन करने वाला अणु है, जो लोहा और इस्पात, रसायन और परिवहन जैसे क्षेत्रों को डीकार्बोनाइज करने में सक्षम है।
  • ग्रीन हाइड्रोजन ऊर्जा भंडारण के लिए खनिजों और दुर्लभ-पृथ्वी तत्व-आधारित बैटरी पर निर्भरता को कम करने में मदद करेगा।
  • जिस अक्षय ऊर्जा को ग्रिड द्वारा संग्रहीत या उपयोग नहीं किया जा सकता है, उसका हाइड्रोजन-उत्पादन करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

इंस्टा जिज्ञासु:

  1. केंद्रीय बजट 2021 में ‘राष्ट्रीय हाइड्रोजन ऊर्जा मिशन’ के शुभारंभ का प्रस्ताव किया गया है। इसकी प्रमुख विशेषताएं के बारे में जानिए
  2. क्या आप ग्रीन, ब्लू और ग्रे हाइड्रोजन में अंतर जानते हैं?  Read here

स्रोत: पीआईबी


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


भारत का राष्ट्रीय इंटरनेट एक्सचेंज (NIXI)

भारत का राष्ट्रीय इंटरनेट एक्सचेंज (National Internet Exchange of India – NIXI), कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 8 के अंतर्गत एक गैर-लाभकारी संगठन है।

यह वर्ष 2003 से भारत के नागरिकों को निम्नलिखित गतिविधियों के माध्यम से इंटरनेट के बुनियादी ढांचे को फैलाने के लिए काम कर रहा है:

  1. इंटरनेट एक्सचेंज, जिनके माध्यम से विभिन्न आईएसपी और डेटा सेंटर के बीच इंटरनेट डेटा का आदान-प्रदान किया जाता है।
  1. .IN (डॉट आईएन) रजिस्‍ट्री, आईएन कंट्री कोड डोमेन का प्रबंधन व संचालन और भारत के लिए भारत IDN (आईडीएन) डोमेन।

बायोटेक-किसान कार्यक्रम

(Biotech-KISAN Programme)

  • यह किसानों के लिए एक किसान-केंद्रित योजना है, जिसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के तहत किसानों द्वारा और उनके साथ मिलकर विकसित किया गया है।
  • यह एक अखिल भारतीय कार्यक्रम है, जो हब-एंड-स्पोक (hub-and-spoke) मॉडल का अनुसरण करता है। यह किसानों में उद्यमशीलता और नवाचार को प्रोत्साहित करता है और महिला किसानों को सशक्त बनाता है।
  • यह महिला और पुरुष किसानो के मध्य स्थानीय कृषि नेतृत्व की पहचान करता है और उसे बढ़ावा देता है। इस प्रकार का नेतृत्व, जानकारी के हस्तांतरण की सुविधा के अलावा विज्ञान आधारित खेती को विकसित करने में मदद करता है।

अजीत मिश्रा विशेषज्ञ समूह

  • केंद्र सरकार द्वारा प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर अजीत मिश्रा की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया गया है।
  • इस समूह का कार्य, सरकार को न्यूनतम मजदूरी और राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण के बारे में तकनीकी जानकारी और सिफारिशें प्रदान करना है।

Join our Official Telegram Channel HERE for Motivation and Fast Updates

Subscribe to our YouTube Channel HERE to watch Motivational and New analysis videos

[ad_2]

Leave a Comment